राष्ट्रीय चेतना को चेताने में राष्ट्र कवि दिनकर जी की भूमिका
शैलेन्द्र कुमार ठाकुर
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, डॉ. खूबचंद बघेल शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई-3, दुर्ग
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
राष्ट्र कवि दिनकर के काव्य में अपने युग की पीड़ा का मार्मिक अंकन हुआ है । उनके काव्य में भारतीय संस्कृति की पूर्ण झलक के साथ ही साथ सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतना का अलौकिक दृश्य भी परिलक्षित होता है। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना का व्यापक एवं दिव्य स्वरूप दिखाई पड़ता है। एक ओर उनकी कविता में हुंकार है तो दूसरी ओर शोषित पीड़ित उपेक्षित भारतीयों को जगाने के लिए वे क्रान्ति की मशाल लिए खड़े हैं। परशुराम की प्रतीक्षा में वे सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहर को दर्शाते हुए उनके शौर्य एवं वीरोचित भाव को दिखाते हैं। दूसरी तरफ वे गांधीवाद से प्रभावित होने के कारण मानवीय मूल्य की गौरवमयी गाथा को भी गाते हैं। उनकी कविता में जहां राष्ट्र जागरण जनजागरण की ज्वाला दिखाई देती है वहीं वे आम आदमी के साथ खड़े हो कदम से कदम मिला देश धर्म की मिट्टी के मूल्य चुकाने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
KEYWORDS: सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतना
INTRODUCTION:
राष्ट्र कवि दिनकर जी ने भारत की सुसुप्त जनता को जगाने के लिए उनकी सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने भारत के अतीत व गौरवमयी आदर्ष सांस्कृतिक महत्ता एवं अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कार्यों से हम सभी भारतवासियों को परिचित कराया। इस संदर्भ में निधि भार्गव का कथन सत्य है कि दिनकर जी जनजागरण चाहते थे। इसी कारण से विद्रोही व क्रान्तिकारी कवि बने। वे स्वभाव से भावुक व कल्पनाशील थे परन्तु वातावरण तथा संस्कार ने राष्ट्रीयता का स्वरूप ले लिया।1 वास्तव में दिनकर जी ने अपनी कविता जो जनजागरण का हथियार बनाया। उनकी रचनायें आम जनमानस के मष्तिष्क पर आघात करती है। उनको झकझोरती है। उन्हें जगाने का प्रयास करती है।
भारत के अधिकांश लोग सदियों की गुलामी से पीड़ित थे। उनकी सुप्त चेतना को झकझोर कर जगाना जरूरी था। दिनकर का काव्य इन्हीं कारणों से जनजागरण का काव्य माना जाता है। युग कवि दिनकर ने राष्ट्रीय जनजागरण के लिए रक्त क्रान्ति के लिए गीत भी लिखा। वे लिखते हैं कि:-
गत विभूति भावों की आशा ले, युग धर्म पुकार उठे।
सिंहों की धन अंध में जागृति की हुॅकार उठे।।
दिनकर जी ओज, शौर्य, हुंकार एवं उत्तेजना लाने वाले कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे परषुराम की प्रतिक्षा में लिखते हैं कि –
गरजो, अॅबर को भरो रणोच्चार से
क्रोधान्ध शेर हॉकों से हंकारों से
यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है
मूढ़ो स्वतंत्रता पर ही संकट है। 2
राष्ट्र कवि दिनकर की रचनाओं में सोये हुए भारतीय समाज को जगाने का आव्हान है। वे हुंकार में लिखते हैं कि
जागो गौतम! जागो महान
जागो अतीत के क्रान्ति - गान।
जागो जगती के धर्म तत्व
जागो हे ! बोधिसत्व।। 3
दिनकर महात्मा बुद्ध महावीर के ज्ञान एवं शान्ति को तो स्वीकार करते हैं वे उनके माध्यम से भारतीय जनजागरण का महामंत्र भी फूकते हैं। उन्हें श्रीकृष्ण प्रिय लगते हैं। उनके लिए परशुधारी राम परशुराम प्रिय लगते हैं। क्योंकि उन्होंने बर्बर राजाओं की संस्कृति, कर्म एवं उनके चिंतन का नाष किया था। वे भारतीय समाज में उनके खोये हुए विश्वास को पुनः लौटाना चाहते थे। दिनकर जी भारत मॉ के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए भारतीय जनों को प्रेरित करते हैं। वे उनकी खोयी हुई सुसुप्त चेतना को जगाकर पुनः जागृत करना चाहते हैं। वे परशुराम की प्रतीक्षा में लिखते हैं कि -
सामने देश माता का भव्य चरण है
जिह्वा पर जलता हुआ एक बस प्रण है
काटेंगे अरि का मुंड कि स्वयं कटेंगे
पीछे परन्तु सीमा से नहीं हटेंगे ।। 4
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीयता की भावना दिलो दिमाग से उपजती है । जिस भी व्यक्ति में अपने देश की मिट्टी अपनी सनातन संस्कृति धर्म एवं अपनी मातृभूमि से प्रेम होगा वह देश का केवल भौगोलिक इकाई नहीं मानेगा। इसे अपना धर्म, राष्ट्र धर्म दिखाई देगा।
आजादी के दिवाने राष्ट्र नायकों ने जिस तरीके से अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया था। वह हजारों हजारों वर्ष की गुलामी के जंजीर को तोड़ने का सद्प्रयास था। राष्ट्र कवियों ने चिंतकों ने अपनी स्वाभाविक चिन्ता को अपनी कविता में राष्ट्रोत्थान राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना को किसी न किसी रूप में उद्घाटित किया है।
दिनकर की राष्ट्रीय चेतना के बारे में डॉ. दीक्षित का मत है कि -‘‘दिनकर के काव्य में राष्ट्रीय भावनाओं की तीन पहलु आते हैं । प्रथम सोपान के अन्तर्गत दिनकर की वे कवितायें आती हैं जिनमें तीव्र देश प्रेम भावना व्यक्त की गयी है जो अतीत के जीवन मूल्यों के प्रति आस्था के माध्यम से व्यक्त किया गया है। कुरूक्षेत्र, रश्मिरथी के अतिरिक्त अनेक स्फुट कविताओं में राष्ट्रीय भावना का भाव बोध प्रगट हुआ है। तीसरे सोपान के अन्तर्गत वे सभी रचनायें आती हैं जिसमे देश प्रेम की भावना उतनी तीव्र और स्थाई नहीं है जितनी की सामयिक प्रेरणा दिल्ली नीम के पत्ते, हुंकार में जो कविताएं हैं उसमें आती है।‘‘5
दिनकर के मानस के मानवतावाद कूट-कूटकर भरा हुआ था। वे प्रगतिवादी मानवतावाद के पक्षधर थे। वे आम आदमी के बारे में गरीबों शोषितों पीड़ित एवं उपेक्षित जनों के प्रति उनके मन में स्वाभाविक चिन्ता थी। दिनकर के मन में स्वदेश प्रेम की राष्ट्रीय बोध था?। वहीं उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है । वे लिखते हैं कि –
दहक रही मिट्टी स्वदेश की खौल रहा गंगा का पानी।
प्राचीरों में गरज रही है जंजीरों में कसी जवानी ।।
अर्पित करो समिध आओ हे समता के अभिमानी
इस कुण्ड से निकलेगी भारत की लाल भवानी ।। 6
डॉ. देवी प्रसाद गुप्त जी लिखते हैं कि -‘‘कवि श्री दिनकर जी की काव्य साधना का समारंभ राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की वेला में हुआ। जब जनमानस उत्कृष्ट भावनाओं से आन्दोलित था। स्वतंत्रता की बलि बेदी पर सर्वस्व समर्पण करने की होड़ मची हुई थी। आम लोगों के मानस में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना प्रबल थी। लोग विध्वंस के पथ पर अग्रसित थे। इस क्रान्तिधर्मा समय में राष्ट्रकवि दिनक जी का एक क्रान्तिधर्मा बन जाना स्वाभाविक था ।‘‘7
राष्ट्रकवि दिनकर जी की राष्ट्रीयता भाववादी है जिसमें चिंतन के साथ ही साथ आक्रोश भी है। अंग्रेजी राज्य के खिलाफ प्रबल विरोध इनकी रचनाओं में देखने को मिलता है। दिनकर जी के काव्य में राष्ट्रीय चिंतन के साथ ही साथ सांस्कृतिक धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक राष्ट्रोत्थान की भी चिन्ता स्वाभाविक रूप से देखने को मिलती है। दिनकर जी की रचनाओं में क्रान्ति का उद्घोष है। जनमानस के प्रति हुंकार है प्रतिकार है विरोध है वे शोषक वर्ग के खिलाफ काव्य क्रान्ति कर रहे हैं। राष्ट्र कवि दिनकर जी मैथिलीशरण गुप्त एवं माखन लाल चतुर्वेदी की तरह राष्ट्रवादिता के कवि थे। इनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता के बोध के साथ ही साथ मानवीय मूल्यों के प्रति स्वाभाविक चिन्ता भी है। जिस तरह से निराला ने भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने स्वयं संत कवि कबीर ने जनजागरण का वृहद अभियान चलाया था जिसे लोक जागरण जनजागरण कहा गया। ठीक उसी तरह से राष्ट्रीय भावना से ओत प्रेात होकर कवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जनमानस को जगाने का काम किया था।
डॉ. देवी प्रसाद गुप्त ने दिनकर जी के बारे मे लिखा है कि ‘‘कवि श्री दिनकर जी की काव्य साधना का समारंभ स्वाधीनता संग्राम की बेला में हुआ जब जनमानस उत्कृष्ट भावनाओं से प्रेरित था। उस समय स्वतंत्रता की बलि बेदी सर्वरूप समर्पण करने की होड़ मची हुई थी। क्रान्ति की ज्वाला चारो तरफ फैली हुई थी। आम जनता बगावत कर चुकी थी। विप्लव विरोध विध्वंस क्रान्ति को लोग जन जागरण का हथियार बना चुके थे। ऐसी विध्वंसात्मक स्थिति में युवा कवि दिनकर ने राष्ट्रीय जनजागरण को अपना लक्ष्य बनाया।‘‘
राष्ट्र कवि दिनकर की रचनाएँ आग उगलती थी। स्वदेश प्रेम राष्ट्र प्रेम की भावना से प्रज्वलित ओत प्रोत इनकी रचनाओं से जन मन में राष्ट्र प्रेम की ज्वाला धधक उठी। वैसे दिनकर जी महात्मा गांधी जी से अवश्य प्रभावित थे। फिर भी वे परशुरामवंशीय थे। ब्रम्हर्षि समाज के सुचिंतक थे। वे परषुराम को अपना आदर्ष मानते हैं। उनका मानना है कि दुष्ट मलेच्छ पापी पामर विदेषी ये हमारे कभी भी अपने नहीं हो सकते। वे उन लोगों को विधर्मो मलेच्छ मानते हैं। जैसे परशुराम जी ने दुष्टों का संहार किया था। वैसे ही आम जनता को इस हेतु खड़ा होना होगा। वे लिखते हैं कि –
दासत्व जहॉ वहीं स्तब्ध जीवन है
स्वातंर्त्य निरन्तर समर सनातन रण है
स्वतंत्रता समस्या नहीं आज या कल की
जगृति तीव्र वह घड़ी पल-पल की
तिलक चढ़ा मत और हृदय को टूक दो
दे सकते हो तो गोली बंदूक दो ।। 6
रामधारी सिंह दिनकर जी प्रगतिवादी एवं स्वच्छतावादी कवि थे। वे रूढ़ियों पर प्रहार करना जानते थे। वे विषमता, शोषण एवं अराजकता के प्रबल विरोधी थे। वे कायर नपुंसक एवं देश विरोधी गद्दारों को चेतावनी देते हुए कहते हें कि -
अब समझा चुप्पी कायरता की वाणी है
बहुत अधिक चातुर्य आपदाओं का घर है
दोषी केवल वहीं नहीं जो नयन हीन था
उसका भी है पाप ऑंख थी किन्तु जो
बड़ी-बड़ी घड़ियों में मौन तटस्थ रहा है । 8
कवि दिनकर के बारे में आलोचक पुष्पा ठक्कर लिखती हैं कि - ‘‘राष्ट्र कवि दिनकर हमें अमेरिकी फ्रंसिसी कान्ति की याद दिलाते हैं। इतिहास के ऑसू को लिखकर कवि ने यह बतलाया है कि भारत किसी अन्य देश को गुलाम नहीं बनाना चाहता है। न ही वह किसी और का दास बनकर रहना चाहता है। यदि वह हमसे प्रेम व्यवहार करेगा तो हम प्रेम व्यवहार से बात करें। अगर वह हमसे खड्ग तलवार की बात करेगा तो हम भी शक्तिशाली खड्ग तलवार से वार करेंगे।‘‘ 7
कवि दिनकर की रचनाओं में ओज है, विद्रोह है, हुंकार है व गुलामी की पीडा से पीड़ित भारतवासियों के दिलो दिमाग में स्वतंत्रता की आग जला रहे थे। जिसकी ज्योति घर-घर में जलने लगी थी । वे रेणुका में लिखते हैं कि -
दो आदेश फूँक दूगी उठे प्रभाती राग महान
तीनों काल ध्वनित हो स्वर में जागे सुप्त भुवन के प्राण
गत विभूति भावी की आषा ले युगधर्म पुकार उठे
सिंहों की धनं अंध गुहा में जागृत की हुंकार उठे । 9
राष्ट्र कवि दिनकर ने शोषित पीड़ित उपेक्षित जन की पुकार बन कर क्रान्ति की मशाल लिए आगे बढ़े थे। जिसमें किसान क्रान्तिकारी युवक एवं आम भारती जन ने जुड़कर स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी। निःसंदेह कवि दिनकर की रचनाएँ आग उगलने का काम किया जिससे भारतीय जनमानस जागृत हुआ।
निष्कर्ष:-
राष्ट्र कवि दिनकर स्वाधीनता आंदोलन के पुरोधा थे। उनकी अधिकतर रचनाएँ राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन को जन मन तक पहुँचाने वाली थी। उन्होने अपनी रचनाओं द्वारा अपने युग को प्रभावित किया। उनकी रचनाओं में स्वदेश प्रेम, राष्ट्रीय सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक चेतना को चेताने वाला था। वे गांधीवाद से अवश्य प्रभावित थे लेकिन परशुराम को विवेकानंद को अपना आदर्श पुरूष मानते थे। उनकी रचनाओं में हुंकार रश्मिरथी कुरूक्षेत्र परशुराम की प्रतिक्षा में देश प्रेम एवं राष्ट्रीय चेतना को चेताने वाला भाव परिलक्षित होता है। दिनकर ने इतिहास को ही साक्षी मानकर राम कृष्ण परशुराम को अपना आदर्श पुरूष माना। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्र धर्म को अपना मूल धर्म माना। वास्तव में उनकी रचनाएँ राष्ट्रीय चेतना को चेताने वाली भारतीय संस्कृति एवं धर्म ध्वजा की पताका को जन मन में फहराने वाली थी। वे राष्ट्रवादी एवं जन मन के जनजागरण के कवि थे।
संदर्भ ग्रंथ:-
1. दिनकर के काव्य में क्रान्तिकारी चेतना - निधि भार्गच पृ. से 33
2. परशुराम की प्रतिक्षा दिनकर - पृ. संख्या 14
3. प्रभाकर कुमार प्रभात, दिनकर समय का सूर्य, विनय प्रकाशन प्रथम संस्करण 2021 पृष्ठ 43
4. दिनकर का रचना संसार डॉ. छोटे लाल दीक्षित पृ. से 188
5. राष्ट्र कवि दिनकर और उनका साहित्य देवी प्रसाद गुप्त पृ. से 55
6. परशुराम की प्रतिक्षा - दिनकर
7. वही
8. रेणुका - दिनकर पृ.
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Received on 29.03.2025 Revised on 31.05.2025 Accepted on 12.07.2025 Published on 25.08.2025 Available online from September 08, 2025 Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(3):162-166. DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00024 ©A and V Publications All right reserved
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